शिक्षा की गरिमा और राष्ट्रीय एकता का प्रश्न
भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली और संस्थानिक ढांचे में हो रहे हालिया विवादों ने एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया है। विशेषकर UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के संचालन में आने वाली बाधाएं सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्र की नींव हमारे युवाओं के भविष्य से जुड़ी हैं। भारत जैसे महान और विविध राष्ट्र को जोड़ने वाला सबसे मजबूत सूत्र 'समान अवसर' है। जब हमारी शिक्षा संस्थाएं विवादों के घेरे में आती हैं, तो इसका सीधा प्रभाव देश की अखंडता पर पड़ता है। १. योग्यता (Merit) पर संकट और सामान्य वर्ग की पीड़ा सामान्य वर्ग के युवाओं के पास आगे बढ़ने के लिए 'मेरिट' के अलावा अन्य कोई सुरक्षा कवच नहीं होता। जब परीक्षाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे गहरा आघात उसी छात्र को लगता है जिसने वर्षों तक अनुशासन के साथ तैयारी की है। यह अनिश्चितता समाज में एक अदृश्य विभाजन पैदा करती है, जहाँ मध्यम और सामान्य वर्ग का युवा खुद को व्यवस्था में उपेक्षित महसूस करने लगता है। २. देश के विभाजन का भय किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसके युवाओं के संतोष में निहित होत...